परिहर तं मिच्छत्तं सम्मत्ताराहणाए दढचित्तो ।
होदि णमोक्कारम्मि य णाणे वदभावणासु धिया॥731॥
अतः क्षपक समकित की आराधन से मिथ्याभाव तजो ।
नमस्कार में ज्ञान और व्रत-भावों में तव चित दृढ़ हो॥731॥

  सदासुखदासजी