मयतण्हियाओ उदयत्ति मया मण्णंति जह सतण्हयगा ।
सब्भूदंति असब्भूदं तध मण्णंति मोहेण॥732॥
यथा तृषा पीड़ित मृग को मृग-तृष्णा में जल भासित हो ।
वैसे मिथ्या-दर्शन से नर असद्भूत को सत जाने॥732॥
अन्वयार्थ : संसार-परिभ्रमण का मूल कारण जो मिथ्यात्व उसको सर्वप्रकार से मन, वचन, काय से वर्जन/त्याग करो । गुणों से सहित बुद्धि को भी मिथ्यात्व मोहित करता है । हे मुने! मिथ्यात्व का त्याग करना और सम्यक्त्वाराधना में, पंच नमस्कार करने में, ज्ञानभावना में, व्रत भावना में बुद्धिपूर्वक दृढचित्त होओ । इस मिथ्यात्व से समस्त पदार्थ को विपरीत ग्रहण करते हैं । जैसे जल की तृष्णासहित मृग/वन का जीव, वह मृगतृष्णा को जल मानता है, वैसे ही संसारी जीव मोह से असत्यार्थ को भी सत्यार्थ मानते हैं ।

  सदासुखदासजी