
मिच्छत्तमोहणादो धत्तूरयमोहणं वरं होदि ।
वह्नेदि जम्ममरणं दंसणमोहो दु ण दु इदरं॥733॥
मोह उदय से जनित मोह से श्रेष्ठ धतूरे का है मोह ।
जन्म-मरण में वृद्धि करे यह, करे नहीं एेसा वह मोह॥733॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्व से उत्पन्न मोह, उसकी अपेक्षा, धतूरे से उत्पन्न मोह अति भला/अच्छा है । जैसे दर्शनमोह का उदय अनंतानंत जन्म-मरण बढाता है, वैसे धतूरा नहीं बढाता । धतूरा, खाने वाले को तो थोडे समय उन्मत्त करता है, परंतु मिथ्यादर्शन तो अनन्तानन्त भवों पर्यंत अचेत कर-करके मारता है । इसलिए जो जन्म-मरण के दु:खों से भयभीत हैं, वे मिथ्यादर्शन का त्याग कर देते हैं ।
सदासुखदासजी