+ अब यहाँ कोई कहेगा - मिथ्यात्व का त्याग तो पहले ही करके मुनिव्रत धारा था, अब यहाँ मिथ्यात्व के त्याग के उपदेश का क्या प्रयोजन है? उसका उत्तर कहते हैं- -
जीवो अणादिकालं पयत्तमिच्छत्तभाविदो संतो ।
ण रमेज्ज हु सम्मत्ते एत्थ पयत्तं ख कादव्वं॥734॥
काल अनादि वर्त रहे मिथ्याभावों को भाता जीव ।
कभी न भाया समकित को इसलिए उसी का यत्न करो॥734॥
अन्वयार्थ : अनादिकाल से मिथ्यात्व में प्रवर्तता - अनुभव करता हुआ जीव सम्यक्त्व में नहीं रमता है, इसलिए सम्क्त्व ही में प्रयत्न करना योग्य है ।

  सदासुखदासजी