पं-सदासुखदासजी
अग्गिविसकिण्हसप्पादियाणि दोसं ण तं करेज्जण्हू ।
जं कुणदि महादोसं तिव्वं जीवस्स मिच्छत्तं॥735॥
कृष्णसर्प अरु अग्नि विषादिक करें नहीं वैसी हानि ।
मिथ्यादर्शन तीव्र करे जैसी जीवों की अति हानि॥735॥
सदासुखदासजी