
अग्गिविसकिण्हसप्पादियाणि दोसं करंति एयभवे ।
मिच्छत्तं पुण दोसं करेदि भवकोडिकोडीसु॥736॥
अग्नि विषादिक मात्र एक ही भव में दुखदायक होते ।
मिथ्यादर्शन किन्तु जीव को कोटि-कोटि भव दुःख देते॥736॥
अन्वयार्थ : जीव के जो तीव्र दोष मिथ्यात्व करता है; इतना महादोष अग्नि, विष, कृष्ण सर्प आदि नहीं करते । अग्नि, विष, सर्पादि तो एक भव में दोष करते हैं, दु:ख देकर मारते हैं; परन्तु मिथ्यात्व तो कोडाकोडी या असंख्यात भवों - अनन्तभवों पर्यंत दोष करता है, मारता है ।
सदासुखदासजी