
मिच्छत्तसल्लविद्धा तिव्वाओ वेदणाओ वेदंति ।
विसलित्तकंडविद्धा जह पुरिसा णिप्पडीकारा॥737॥
मिथ्यादर्शन शल्य विद्ध नर तीव्र वेदना को भोगें ।
यथा विषैले बाण विद्ध नर बचे नहीं निश्चित मरते॥737॥
अन्वयार्थ : जैसे विष से लिप्त बाण, उससे वेधा गया जो पुरुष, उसका इलाज नहीं - वह मरण को ही प्राप्त होता है, वैसे ही मिथ्यात्व शल्य से वेधा गया पुरुष भी निगोद में नरकतिर्यञ्च में अनंतानंतकाल तक तीव्र वेदना को अनुभवता है । इलाज के द्वारा निकाल लेने का उपाय ही नहीं है ।
सदासुखदासजी