पं-सदासुखदासजी
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वेैसे ही कोई कहे कि - एक मिथ्यात्व हमारे को है तो रहने दो । मैं तो दुर्धर चारित्र धारण करता हूँ । वह चारित्र मुझे संसार के दु:खों से निकालने में समर्थ है । ऐसी आशंका करते हैं? ऐसा नहीं है, यह दिखाते हैं-
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कडुगम्मि अणिव्वलिदम्मि दुद्धिए कडुगमेव जह खीरं ।
होदि णिहिदं तु णिव्वलियम्मि य मधुरं सुगंधं च॥739॥
ज्यों अशुद्ध कड़वी तूम्बी में रखा दूध भी कटु होता ।
शुद्ध पात्र में रखा दूध तो मिष्ट सुगन्धित ही होता॥739॥
सदासुखदासजी