
तह मिच्छत्तकडुगिदे जीवे तवणाणचरणविरियाणि ।
णसंति वंतमिच्छत्तम्मि य सफलाणि जायंति॥740॥
त्यों मिथ्यात्व कटुक जीवों के ज्ञान-चरित-तप वीर्य सभी ।
हों विनष्ट, मिथ्यात्व रहित के सफल होय ज्ञानादि सभी॥740॥
अन्वयार्थ : जैसे अशुद्धगिरि/दलसहित कडवी तूँबी में रखा गया दुग्ध भी कडवा हो जाता है और गिरि/दल निकालकर शुद्ध तँूबी में रखा गया दूध मधुर रहता है, सुगंधित रहता है । वैसे ही मिथ्यात्व से कटुक जीव के द्वारा ग्रहण किये गये तप, ज्ञान, चारित्र, वीर्य सभी नाश को प्राप्त होते हैं और जिस जीव का मिथ्यात्व नष्ट हो गया है, उस जीव के द्वारा ग्रहण किये गये तप, ज्ञान, चारित्र, वीर्य सफल होते हैं ।
सदासुखदासजी