+ अब नौ गाथाओं में सम्यक्त्व की शिक्षा देते हैं- -
मा कासि तं पमादं सम्मत्ते सव्वदुक्खणासयरे ।
सम्मत्तं खु पदिट्ठा णाणचरणवीरियतवाणं॥741॥
सब दुःख नाशक समकित में तुम कभी प्रमाद नहीं करना ।
ज्ञान चरित तप वीर्य आदि का समकित ही आधार कहा॥741॥
अन्वयार्थ : हे मुने! सर्व सांसारिक दु:खों का नाश करने वाला सम्यग्दर्शन, उसे धारण करने में प्रमादी मत होना, आलसी मत होना । सम्यग्दर्शन जिस प्रकार उज्ज्वल हो, दृढ हो, वैसा उद्यम निरंतर करो; क्योंकि ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य का आधार सम्यग्दर्शन है । सम्यक्त्व बिना ज्ञान, चारित्र, तप, वीर्य एक भी नहीं होते ।

  सदासुखदासजी