सम्मद्दंसणरयणं णग्घदि ससुरासुरो लोओ ।
सम्मत्तस्स य लंभे तेलोक्कस्स य हवेज्ज जो लंभो॥747॥
इन्द्रादिक कल्याण शृंखला शुद्ध समकिती पाते जीव ।
यदि त्रिलोक संपति दें तो भी समकित रत्न मिले न कभी॥747॥

  सदासुखदासजी