पं-सदासुखदासजी
कल्लाणपरंपरयं लहंति जीवा विसुद्धसम्मत्ता ।
सम्मद्दंसणलंभो वरं खु तेलोक्कलंभादो॥748॥
सम्यग्दर्शन के बदले में तीन लोक की सुनिधि मिले ।
तो त्रिलोक को पाने से भी सम्यग्दर्शन श्रेष्ठ कहें॥748॥
सदासुखदासजी