
लद्धूण वि तेलोक्कं परिवडदि हु परिमिदेण कालेण ।
लद्धूण य सम्मत्तं अक्खयसोक्खं हवदि मोक्खं॥749॥
तीनलोक की निधि तो मिलकर अरे बिछुड़ती कुछ दिन बाद ।
किन्तु प्राप्त करके समकित तो अविनाशी सुख होता प्राप्त॥749॥
अन्वयार्थ : एक तो सम्यक्त्व का लाभ, दूसरा त्रिलोक का लाभ, उनमें त्रैलोक्य के लाभ उनमें से भी सम्यग्दर्शन का लाभ श्रेष्ठ है । धरणेन्द्रपने का लाभ, नरेन्द्रपने का लाभ, देवेन्द्रपने का लाभ प्राप्त करके भी जीव का प्रमाणीककाल में पतन होता ही है । त्रैलोक्य का राज्य पाकर भी राज्य से छूट कर मरण करके चतुर्गति में परिभ्रमण ही करता है और सम्यक्त्व प्राप्त हो तो चतुर्गति संसार में जन्म-मरण नहीं करते हैं, अविनाशी सुख को ही प्राप्त होते हैं । अत: सम्यक्त्व के लाभ समान त्रैलोक्य का लाभ भी श्रेष्ठ नहीं । इस प्रकार नौ गाथाओं में सम्यक्त्व की महिमा का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी