+ अब नौ गाथाओं द्वारा जिनेन्द्रादिक की भक्ति की महिमा कहते हैं- -
अरहंतसिद्धचेदियपवयण - आयरियसव्वसाहूसु ।
तिव्वं करेहि भत्ती णिव्विदिगिंच्छेण भावेण॥750॥
अर्हन्त, सिद्ध, प्रतिबिम्ब तथा प्रवचन आचार्य साधुओं में ।
तीव्र भक्ति तुम करो क्षपक विचिकित्सा विरहित भावों से॥750॥
अन्वयार्थ : हे आत्मकल्याण के अर्थी! अरहन्त, सिद्ध और चैत्य अर्थात् अरहन्त-सिद्धों के प्रतिबिम्ब और प्रवचन/जिनेन्द्र प्ररूपित परमागम, आचार्य और सर्व साधु - इनमें विचिकित्सा/ भावों की मलिनता रहित - भावों की शुद्धता पूर्वक तीव्र भक्ति करो ।

  सदासुखदासजी