संवेगजणिदकरणा णिस्सल्ला मंदरोव्व णिक्कंपा ।
जस्स दढा जिणभत्ती तस्स भवं णत्थि संसारे॥751॥
भव भय से उत्पन्न, शल्य बिन अरु सुमेरुवत् जो निष्कम्प ।
दृढ़ जिन भक्ति जिसको होती उसे नहीं होता भव-भय॥751॥
अन्वयार्थ : जिस पुरुष को जिनेन्द्र भगवान में दृढ भक्ति है, उस पुरुष को संसार का भय नहीं । कैसी है भक्ति? संसार परिभ्रमण से भयभीत जीवों को उत्पन्न होती है, संसार में रचे मूढ जीवों को भक्ति उत्पन्न नहीं होती है । इसलिए सम्यग्ज्ञानपने का पाया है आत्मलाभ जिसने और मिथ्यात्व, मायाचार, निदान - इन तीन शल्यों से रहित मेरु के समान अचल/चलायमान नहीं होता - ऐसी जिनभक्ति जिसके हुई, उसके संसार का अभाव हो ही गया ।

  सदासुखदासजी