
एया वि सा समत्था जिणभत्ती दुग्गइं णिवारेण ।
पुण्णाणि य पूरेदुं आसिद्धिपरंपरसुहाणं॥752॥
दुर्गति का वारण करने में पुण्य कर्म करने में पूर्ण ।
सिद्धि सुखों की परम्परा में जिन भक्ति ही एक समर्थ॥752॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र भगवान की भक्ति एकमात्र दुर्गति निवारण करने में समर्थ है और सिद्धिपर्यन्त सुखों के कारण रूप पुण्य प्रकृति अथवा शुद्ध भावों को परिपूर्ण करने में समर्थ है, अत: जिनभक्ति को ही प्राप्त होओ । यह भक्ति आभ्यन्तर और बाह्य के भेद से दो प्रकार की है । उनमें परमात्मा के शुद्ध निर्विकार ज्ञान-दर्शन स्वभाव में अपने आत्मा को ऐसा लीन करे कि भेद ही नहीं दिखे - साक्षात् परमात्मस्वभाव के अनुभव में लीन हो जाना - यह आभ्यन्तर भक्ति है और परमात्मा के द्वारा कथित दशलक्षण धर्म तथा जीवदया रूप धर्म में प्रीति करना तथा रागादि पर विजय करके जिनेन्द्र की आज्ञा प्रमाण प्रवृत्ति करना, वह बाह्य भक्ति है ।
सदासुखदासजी