तह सिद्धचेदिए पवयणे य आइरियसव्वसाधूसु ।
भत्ती होदि समत्था संसारुच्छेदणे तिव्वा॥753॥
तथा सिद्ध परमेष्ठी, प्रवचन, बिम्ब सर्व साधु आचार्य ।
तीव्र भक्ति इनके प्रति होती है संसार विनाश समर्थ॥753॥
अन्वयार्थ : जैसे अरहन्त भक्ति को कल्याणकारिणी कहा, वैसे ही सिद्ध भगवान में तथा अरहन्त के प्रतिबिम्बों में, सर्व जीवों के उपकारक जिनेन्द्र के परमागम में, आचार्य-उपाध्यायों में तथा सर्व साधुओं में तीव्र भक्ति, वह संसार को छेदने में समर्थ है । इसलिए इनके गुणों में जो अनुराग है, वही आत्मगुणों में अनुराग है और जो आत्मगुणों में अनुराग है, वही परमेष्ठी के गुणों में अनुराग है । वीतराग स्वभाव से पूर्व अवस्था में अनुराग, वह साक्षात् वीतराग रूप आत्मा को करता है । कोई कहे कि अनुराग तो बन्ध का कारण है, यहाँ पंचपरमेष्ठी में अनुराग मोक्ष का कारण कैसे होगा? यह अनुराग विषय-कषायादि या शरीर, धन, बांधवादि परवस्तु में जो अनुराग होता है, वैसा नहीं, जो बंध करे । इनका अनुराग तो सकल परवस्तुओं में राग का अभाव कराके वीतरागरूप निजभाव में स्थिति कराने वाला है । जब तक स्व और परमात्मा दो दृष्टि में आते हैं, तब तक परमात्मा में अनुराग कहलाता है और जब ध्याता, ध्यान और ध्येय की एकता हो जाती है, तब दूसरा दिखता ही नहीं है, अनुराग किससे करें?

  सदासुखदासजी