
विज्जा वि भत्तिवंतस्स सिद्धिमुवयादि होदि सफला य ।
किह पुण णिव्वुदिवीजं सिज्झहिदि अभत्तिमंतस्स॥754॥
भक्तिमान की ही विद्या है सिद्धि प्रदायक और सफल ।
तो फिर भक्ति विहीन पुरुष को मुक्ति बीज कैसे दे फल॥754॥
अन्वयार्थ : भक्ति सहित पुरुष के विद्या भी सिद्ध हो जाती है और भक्तिमान की ही विद्या सफल होती है । अत: विद्या का फल परमात्मस्वरूप में भक्ति जानना और परमात्मा/शुद्धात्मा में भक्ति रहित के निर्वाण का बीज जो रत्नत्रय, वह कैसे सिद्ध होगा?
सदासुखदासजी