तेसिं आराधणणायगाण ण करिज्ज जो णरो भत्तिं ।
धत्तिं पि संजमंतो सालिं सो ऊसरे ववदि॥755॥
आराधन के नायक जिनवर के प्रति जिसको भक्ति नहीं ।
बंजर भू में खेती करता संयम में अति तत्पर भी॥755॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष आराधना के नायक जो अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु इनकी भक्ति को प्राप्त नहीं होता/करता, वह अतिशय रूप संयम धारण करता हुआ भी ऊसर भूमि/खारडी भूमि/बाँझड भूमि में धान्य बोता है । जैसे बाँझड भूमि में बोया गया बीज नाश को प्राप्त हो जाता है, फल की प्राप्ति नहीं होती; वैसे ही अतिशय रूप संयम पालन करता हुआ भी अरहन्तादि की भक्ति बिना मिथ्यादृष्टि ही है तो मोक्षफल कहाँ से प्राप्त होगा?

  सदासुखदासजी