बीएण विणा सस्सं इच्छदि सो वासमब्भएण विणा ।
आराधणमिच्छंतो आराधणभत्तिमकरंतो॥756॥
आराधन नायक की भक्ति नहीं पर उसका फल चाहे ।
बिना बीज के धान्य चाहता बिन बादल वर्षा चाहे॥756॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष आराधना के धारक पंच परमगुरु में भक्ति नहीं रखता है और अपनी आराधना चाहता है, वह बिना बीज के धान्य की इच्छा करता है और बादलों के बिना वर्षा चाहता है ।

  सदासुखदासजी