विधिणा कदस्स सस्सस्स जहा णिप्पादयं हवदि वासं ।
तह अरहादिगभत्ती णाणचरणदंसणतवाणं॥757॥
ज्यों वर्षा उत्पन्न करे विधि-पूर्वक बोया गया अनाज ।
त्यों अर्हत भक्ति है ज्ञान चरित तप की भी उत्पादक॥757॥
अन्वयार्थ : जैसे विधिपूर्वक किया गया धान्य उसे उत्पन्न करने वाली वर्षा होती है । वर्षा के बिना धान्य नहीं होता, वैसे ही अरहन्तादि की भक्ति जीव को दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप आदि गुणों को उत्पन्न करने वाली होती है । अरहन्तादि की भक्ति बिना दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप आदि की उत्पत्ति नहीं होती ।

  सदासुखदासजी