वंदणभत्तीमेत्तेण मिहिलाहिओ य पउमरहो ।
देविंदपाडिहेरं पत्तो जादो गणधरो य॥758॥
मिथिला नृपति पद्मरथ को था मात्र भक्ति-अनुराग हुआ ।
सुरपति से पूजित होकर वह गणधर पद को प्राप्त हुआ॥758॥
अन्वयार्थ : मिथिला नगर का अधिपति पद्मरथ नामक राजा, अरहन्तादि की वंदना मात्र में अनुरागी होकर देवेन्द्र के द्वारा प्रातिहार्यादि को प्राप्त हो गणधर पद को प्राप्त हुआ । ऐसे अरहन्तादि की भक्ति नौ गाथाओं में कही ।

  सदासुखदासजी