+ अब पंच नमस्कार का उपदेश छह गाथाओं द्वारा कहते हैं- -
आराधणापुरस्सरमणण्णहिदओ विसुद्धलेस्साओ ।
संसारस्स खयकरं मा मोचीओ णमोक्कारं॥759॥
आराधन में मुख्य अतः कर चित् एकाग्र शुद्ध परिणाम ।
भव नाशक इस नमस्कार को कभी न छोड़ो तुम गुणवान॥759॥
अन्वयार्थ : भो मुने! अन्य विषय-कषाय, शरीरादि से मन को छुडाकर और एकाग्र मन होते हुए एवं लेश्याओं की उज्ज्वलता अर्थात् कषायों की मंदता को प्राप्त करके आराधना में अग्रसर तथा संसार का नाश करने वाले पंच नमस्कार मंत्र को मत छोडना - उसका निरंतर चिंतवन करो ।

  सदासुखदासजी