
अरहंतणमोक्कारो एक्को वि हविज्ज जो मरणकाले ।
सो जिणवयणे दिट्ठो संसारुच्छेदणसमत्थो॥761॥
मरण समय यदि एक बार भी नमस्कार अर्हन्तों को ।
भव-वेदन में है समर्थ यह कहा जिनागम में उसको॥761॥
अन्वयार्थ : अरहन्त आदि पाँचों का मन से गुणानुस्मरण, वचन से गुणानुवाद और काय से नमस्कार - यह नमस्कार पद का अर्थ है । मरण के समय में एक अरहन्त नमस्कार ही संसार को छेदने में समर्थ है - ऐसा जिनेन्द्र देव के वचन में बतलाया है ।
सदासुखदासजी