
जो भावणमोक्कारेण विणा सम्मत्तणाणचरणतवा ।
ण हु ते होंति समत्था संसारुच्छेदणं कादुं॥762॥
भाव नमस्कार विरहित यदि समकित ज्ञान चरित होवें ।
तो संसार नाश करने में वे भी सक्षम नहिं होते॥762॥
अन्वयार्थ : भाव नमस्कार बिना ये सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र, तप संसार का छेदन करने में समर्थ नहीं होते हैं ।
सदासुखदासजी