
चदुरंगाए सेणाए णायगो जह पवत्तओ होदि ।
तह भावणमोक्कारो मरणे तवणाणचरणाणं॥763॥
चतुरंगी सेना का नायक करे प्रवर्तन सेना का ।
भाव नमस्कार करता है वैसे ज्ञान चरित तप का॥763॥
अन्वयार्थ : जैसे चतुरंग सेना का नायक - प्रवर्तक होता है । नायक बिना सेना कुछ करने में समर्थ नहीं, वैसे ही मरण के समय में भाव नमस्कार है; वह तप, ज्ञान, चारित्र का प्रवर्तक है । भाव नमस्कार के बिना दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप की प्रवृत्ति नहीं होती ।
सदासुखदासजी