
अण्णाणी वि य गोवो आराधित्ता मदो णमोक्कारं ।
चम्पाए सेट्ठिकुले जादो पत्तो य सामण्णं॥765॥
अज्ञानी ग्वाला भी करके नमस्कार का आराधन ।
जन्मा चम्पापुर श्रेष्ठि गृह प्राप्त किया पद श्रेष्ठ श्रमण॥765॥
अन्वयार्थ : अज्ञानी ग्वाले ने भी पंच नमस्कार मंत्र की आराधना करके मरण किया, वह पंच नमस्कार मंत्र के प्रभाव से चंपा नगरी में श्रेष्ठी के कुल में जन्म लेकर मुनिपने को प्राप्त हुआ । इसलिए पंच नमस्कार समान जीव का उपकारक जगत में अन्य नहीं है । ऐसा पंच नमस्कार का प्रभाव छह गाथाओं में कहा ।
सदासुखदासजी