
णाणोवओगरहिदेण ण सक्को चित्तणिग्गहो काउं ।
णाणं अंकुसभूदं मत्तस्स हु चित्तहत्थिस्स॥766॥
बिना ज्ञान-उपयोग कोई नर निग्रह-चित्त न कर सकता ।
ज्ञानांकुश से चित्तरूप गजराज-मत्त वश हो जाता॥766॥
अन्वयार्थ : ज्ञानोपयोग रहित जीव चित्त का निग्रह करने में समर्थ नहीं होता । चित्तरूप मदोन्मत्त हाथी को वश करने में ज्ञान का अभ्यास अंकुश समान है ।
सदासुखदासजी