
विज्जा जहा पिसायं सुट्ठुवउत्ता करेदि पुरिसवसं ।
णाणं हिदयपिसायं सुट्ठुवउत्तं करेदि पुरिसवसं॥767॥
विधि पूर्वक साधी विद्या ज्यों करे पिशाच मनुष्याधीन ।
सम्यक् रीति ज्ञान आराधित हृदय पिशाच करे आधीन॥767॥
अन्वयार्थ : जैसे अच्छी तरह से प्रयुक्त की गई विद्या पिशाचरूप पुरुष को वश में करती है, वैसे ही अच्छी तरह से आराधन किया गया ज्ञान, हृदयरूपी पिशाच को वशीभूत करता है ।
सदासुखदासजी