उवसमइ किण्हसप्पो जह मंतेण विधिणा पउत्तेण ।
तह हिदयकिण्हसप्पो सुट्ठुवजुत्तेण णाणेण॥768॥
विधि पूर्वक प्रयुक्त मन्त्रों से शान्तरूप हो काला नाग ।
सम्यग्ज्ञान मन्त्र से होता शान्त कृष्ण-उररूपी नाग॥768॥
अन्वयार्थ : जैसे विधिपूर्वक आराधन किया गया मंत्र कृष्णसर्प को शांत कर देता है, वैसे ही अच्छी तरह से आराधन किया गया ज्ञान भी मनरूपी काले नाग को उपशम कर देता है ।

  सदासुखदासजी