
आरण्णवो वि मत्तो हत्थी णियमिज्जदे वरत्ताए ।
जह तह णियमिज्जदि सो णाणवरत्ताए मणहत्थी॥769॥
ज्यों कोड़े से जंगली हाथी भी वश में हो जाता है ।
वैसे ज्ञानरूप कोड़े से मन-गज वश में होता है॥769॥
अन्वयार्थ : जैसे बरत्रा/गजबन्धनी से वन का मदोन्मत्त हाथी बाँधा जाता है, वैसे ही ज्ञानरूपी बरत्रा के द्वारा मनरूपी हस्ती को वशीभूत किया जाता है ।
सदासुखदासजी