
जह मक्कडओ खणमवि मज्झत्थो अच्छिदुं ण सक्केइ ।
तह खणमवि मज्झत्थो विसएहिं विणा ण होदि मणो॥770॥
जैसे बन्दर क्षणभर को भी बैठे नहीं विकार विहीन ।
वैसे मन-मर्कट भी क्षण भर को रहता नहिं विषय विहीन॥770॥
अन्वयार्थ : जैसे मर्कट/बन्दर एक क्षण के लिये भी निर्विकार बैठने में समर्थ नहीं/शांत नहीं बैठ सकता, वैसे ही विषयों के बिना यह मन भी क्षण मात्र के लिये भी निर्विकार/शांत रहने में समर्थ नहीं है ।
सदासुखदासजी