
तह्मा सो उड्डहणो मणमक्कडओ जिणोवएसेण ।
रामदेव्वो णियदं तो सो दोसं ण काहिदि से॥771॥
इसीलिए चंचल मन मर्कट को जिन आगम उपवन में ।
सदा रमाओ तो नहिं भटकेगा वह मन रागादिक में॥771॥
अन्वयार्थ : इसलिए एेंठी ऊँठी/आगम की मर्यादा को उल्लंघन करने में तत्पर ऐसा मनरूपी मर्कट/बन्दर जिनेन्द्र देव के उपदेश में निश्चित ही रमाने योग्य है । जिनेन्द्र के आगम में रमने से मनरूपी बन्दर क्षपक को दोष उत्पन्न नहीं करता है ।
सदासुखदासजी