तह्मा णाणुवओगो खवयस्स विसेसदो सदा भणिदो ।
जह विंधणोवओगो चंदयवेज्झं करंतस्स॥772॥
अतः क्षपक के लिए ज्ञान-अभ्यास मुख्यतः कहा गया ।
ज्यों चन्द्रक वेधनकर्त्ता को इसका ही अभ्यास कहा॥772॥
अन्वयार्थ : अत: क्षपक को विशेषकर ज्ञानोपयोग रूप सदा काल प्रवर्तना योग्य है । जैसे चन्द्रकवेध1 को वेधने वाले पुरुष ने व्यधानोपयोग का वर्णन किया ।
1 मरणकण्डिका ग्रन्थ, गाथा 798 का भावार्थ - चन्द्रवेध - महल आदि की छत पर तीव्र वेग से घूमने वाला एक चक्र है । उसमें एक विशिष्ट चिः रहता है, जो कि तीव्र गति से चक्र के साथ घूमता है । उस चन्द्रक के ठीक नीचे जलकुंड जल से भरा रहता है । उस जल में ऊपर का फिरता हुआ चक्र दिखायी देता है । धनुर्विद्या वाला वीर पुरुष जलकुंड में चक्र के चिः को देखकर हाथों से बाण चलाकर उस लक्ष्य को वेध देता है । इसमें देखना नीचे और बाण चलाना ऊपर होता है - ऐसी विशिष्ट बाण चलाने की क्रिया को चन्द्रकवेध कहते हैं ।

  सदासुखदासजी