
णाणपदीओ पज्जलइ जस्स हियए विसुद्धलेस्सस्स ।
जिणदिट्ठमोक्खमग्गे पणासणभयं ण तस्सत्थि॥773॥
जिस विशुद्ध लेश्या परिणत के उर में ज्ञान-प्रदीप जले ।
जिनवर कथित मोक्षपथ में उसको फिर भवभय नहीं रहे॥773॥
अन्वयार्थ : विशुद्धलेश्या के धारक जिस पुरुष के हृदय में ज्ञानरूपी दीपक प्रज्वलित होता है, उस पुरुष को जिनेन्द्र का देख्या/जिनेन्द्र द्वारा दर्शाया गया जो मोक्ष का मार्ग, उसमें विनाश का भय नहीं है । जिस मार्ग में अन्धकार हो, उस मार्ग में विनाश का भय होता है । जिस रत्नत्रय मार्ग में श्रुतज्ञानरूपी दीपक द्वारा स्व-पर पदार्थ का यथार्थ प्रकाश हो रहा है, वहाँ नष्ट हो जाने का भय नहीं होता ।
सदासुखदासजी