
णाणुज्जोवो जोवो णाणुज्जोवस्स णत्थि पडिघादो ।
दीवेइ खेत्तमप्पं सूरो णाणं जगमसेसं॥774॥
है यथार्थ उद्योत ज्ञान ही उसका हो न कभी प्रतिपात ।
सूर्य प्रकाशे अल्प क्षेत्र को ज्ञान समस्त जगत में व्याप्त॥774॥
अन्वयार्थ : ज्ञानरूप उद्योत है, वह अतिशयकारी उद्योत है, अन्य दीपकादिकों का उद्योत तो रुकता है तथा नाश भी होता है; लेकिन ज्ञानरूपी उद्योत को कोई रोकने में समर्थ नहीं एवं नाश भी नहीं होता और न कोई हर सकता है । सूर्य तो थोडे ही क्षेत्र में प्रकाश करता है, परन्तु ज्ञान तो मूर्त अमूर्त सर्व लोक-अलोक को प्रकाशित करता है । इसलिए ज्ञानोद्योत/प्रकाश सर्वोत्कृष्ट है ।
सदासुखदासजी