
णाणं करणविहूणं लिंगग्गहणं च दंसणविहूणं ।
संजमहीणो य तवो जो कुणदि णिरत्थयं कुणदि॥776॥
चरण विहीन ज्ञान अरु दीक्षा ग्रहण करे जो बिन श्रद्धान ।
संयम बिना करे तप जो तो हैं ये सभी निरर्थक जान॥776॥
अन्वयार्थ : चारित्र रहित ज्ञान और सम्यग्दर्शन रहित लिंग/दीक्षा का ग्रहण तथा इन्द्रियसंयम और प्राणी संयमरहित तपश्चरण जो करता है, वह निरर्थक है, व्यर्थ है ।
सदासुखदासजी