दढसुप्पो सूलदहो पंचणमोक्कारमेत्त सुदणाणे ।
उवजुत्तो कालगदो देवो जावो महह्नीओ॥779॥
दृढ़-सूर्य चोर सूली चढ़ मात्र पंच णमोकार श्रुतज्ञान में
उपयोग लगाकर मरकर ऋद्धिधारि सुर हुआ महान॥779॥
अन्वयार्थ : शूली ऊपर वेध्या/चढाया गया दृढसूर्प नामक चोर पंचनमस्कारमंत्र मात्र श्रुतज्ञान में उपयोग लगाकर देह त्यागकर स्वर्ग में उस मंत्र के प्रभाव से महर्द्धिक देव हुआ ।

  सदासुखदासजी