ण य तम्मि देसयाले सव्वो वारसविधो सुदक्खंधो ।
सत्तो अणुचिंतेदुं बलिणा वि समत्थचित्तेण॥780॥
द्वादशांग श्रुत का समस्त अनुचिन्तन नहिं कर सकता है ।
मरण समय सामर्थ्यवान भी मात्र एक ध्या सकता है॥780॥

  सदासुखदासजी