
एक्कम्मि वि जम्मि पदे संवेगं वीदरागमग्गम्मि ।
गच्छदि णरो अभिक्खं तं मरणंते ण मोत्तव्वं॥781॥
जिस पद के चिन्तन से रत्नत्रय श्रद्धा परिपुष्ट बने ।
उसका चिन्तन बार-बार कर, मरण समय भी नहिं तजे॥781॥
अन्वयार्थ : अत्यंत बलवान और समर्थ है जिसका चित्त, ऐसा पुरुष भी मरण के क्षेत्र-काल में सर्व/द्वादश प्रकार के श्रुतज्ञान के चिंतवन करने में समर्थ नहीं है । इसलिए मरण के अवसर में ऐसे किसी एक पद में संवेग/अनुराग को प्राप्त हो कि जिस पद से यह मनुष्य वीतराग के मार्ग को प्राप्त हो । उस पद को मरण के समय में कभी भी छोडना योग्य नहीं है । ऐसे ज्ञानोपयोग का वर्णन सोलह गाथाओं में किया ।
सदासुखदासजी