
परिहर छज्जीवणिकायवधं मणवयणकायजोएहिं ।
जावज्जीवं कदकारिदाणुमोदेहिं उवजुत्तो॥782॥
षट्काय जीव की हिंसा का मन-वचन-काय से त्याग करो ।
कृत-कारित-अनुमोदन से आजीवन इसमें युक्त रहो॥782॥
अन्वयार्थ : भो मुने! समिति में मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना से उपयुक्त होते हुए मरण पर्यंत छहकाय के जीवों के वध/हिंसा का त्याग करो ।
सदासुखदासजी