
जह ते ण पियं दुक्खं तहेव तेसिं पि जाण जीवाणं ।
एवं णच्चा अप्पोवमिवो जीवेसु होदि सदा॥783॥
यथा तुम्हें दुःख इष्ट नहीं वैसे उन जीवों को जानो ।
एेसा निर्णय कर सब जीवों से निज-सम व्यवहार करो॥783॥
अन्वयार्थ : जैसे तुझे दु:ख प्रिय नहीं है, वैसे ही इन छहकाय जीवों के भी जानना । ऐसा जानकर सदा काल सर्व जीवों को अपने समान मानकर उन जीवों के साथ अपने समान प्रवृत्ति करना ।
सदासुखदासजी