
तण्हाछुहादिपरिदाविदो वि जीवाण घादणं किच्चा ।
पडियरं कादुंजे मा तं चिंतेसु लभसु सुदिं॥784॥
अतः क्षुधादिक से पीड़ित होने पर भी जीवों का घात क
रके शान्त करूँ मैं - एेसा मन में कभी करो न विचार॥784॥
अन्वयार्थ : भो मुनीश्वर! तृषा-क्षुधादि से संतप्त होने पर भी जीवों का घात करके इलाज का चिंतवन मत करो । ऐसा स्मरण करना कि मैंने अनंतानंतकाल हिंसा के प्रभाव से बहुत कालपर्यंत क्षुधा-तृषा भोगी । अब यह वेदना क्या है? वेदना का नाश करने वाला संयमभाव हमारे हृदय में निर्विघ्न तिष्ठो/रहो ।
सदासुखदासजी