रदि अरदिहरिसभयउस्सुगत्तदीणत्तणादिजुत्तो वि ।
भोगपरिभोगहेदुं मा हु विचिंतेहि जीववहं॥785॥
प्रीति-अप्रीति-हर्ष-भय-उत्सुकता या हों दैन्यादिक भाव ।
भोग तथा उपभोग हेतु मत करो जीव हिंसा का भाव॥785॥
अन्वयार्थ : मनोज्ञ विषयों से विमुखता वह अरति और हर्ष, भय, उत्सुकपना, दीनपनादि से युक्त होकर भी तुम भोग-परिभोगों के लिये जीवों के वध/हिंसा का चिंतवन मत करो ।

  सदासुखदासजी