महुकरिसमज्जियमहुं व संजमो थोवथोवसंगलियं ।
तेलोक्कसव्वसारं णो वा पूरेहि मा जहसु॥786॥
मधु मक्खीवत् थोड़ा-थोड़ा कर संचित चारित्र किया ।
तीन लोक में सार यदि पूरा न करो पर करो न त्याग॥786॥
अन्वयार्थ : हे मुने! मधुमक्षिका द्वारा संचित किये गये मधु की तरह थोडा-थोडा करके संचय किया गया संयम, उसे त्रैलोक्य का सर्व सार जानकर परिपूर्ण करो । यथाख्यात संयम को प्राप्त करना, यही संयम की पूर्णता है और यदि पूर्ण नहीं कर पाते हो तो जितना धारण किया है, उसे मत छोडो ।

  सदासुखदासजी