दुक्खेण लभदि माणुस्सजादिमदिमदिसवणदंसणचरित्तं ।
दुक्खज्जियसामण्णं मा जहसु तणं व अगणंतो॥787॥
बड़े कष्ट से नरभव, बुद्धि जाति श्रवण दर्शन-चारित्र ।
अरु पाया श्रामण्य इसे तृणसम गिनकर मत त्याग करो॥787॥
अन्वयार्थ : इस जीव ने अनादिकाल से निगोद में ही वास किया है और यदि कोई जीव अनंतानंतकाल में निगोद से निकल कर पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, प्रत्येक वनस्पतिकाय को प्राप्त हो तो संख्यात, असंख्यात काल परिभ्रमण करके पुन: निगोद में ही वास करता है । कैसा है निगोदवास? अनंतानंतकाल में भी जहाँ से निकलना नहीं होता है और कदाचित् अनंतानंतकाल में निकले तो पुन: पृथ्वी आदि में एक, दो, संख्यात, असंख्यात जन्म करके फिर निगोदवास को जाता है । इस प्रकार अनंतानंतकाल तो एकेन्द्रिय में ही वास किया है । त्रस पर्याय पाना दुर्लभ है और कदाचित् त्रस पर्याय पाई तो विकल चतुष्क दो इन्द्रिय से लेकर असैनी पंचेन्द्रिय में परिभ्रमण करके पुन: निगोदवास को प्राप्त हुआ । पुन: वहाँ से निकला तो पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में घोर पाप करके नरकादि दुर्गति को प्राप्त हुआ । मनुष्यजन्म पाना अति दुर्लभ है, मनुष्यजन्म भी पाया तो उत्तम जाति, उत्तम कुल, नीरोग शरीर, दीर्घायु, धनाढ्यता, तीक्ष्ण बुद्धि, धर्मश्रवण, दर्शन-ज्ञान-चारित्र उत्तरोत्तर अत्यन्त दुर्लभता से अनंतानंतकाल में भी कठिनाई से प्राप्त होता है । उसमें भी मुश्किल से प्राप्त श्रमणपने को तृण के समान अवज्ञा करके छोड मत देना ।

  सदासुखदासजी