
जह पव्वदेसु मेरू उच्चाओ होइ सव्वलोयम्मि ।
तह जाणसु उच्चायं सीलेसु वदेसु य अहिंसा॥791॥
यथा लोक में सब पर्वत से ऊँचा है इक मेरु शिखर ।
वैसे ही सब शील व्रतों में सबसे श्रेष्ठ अहिंसाव्रत॥791॥
अन्वयार्थ : जैसे सम्पूर्ण लोक के पर्वतों में मेरुपर्वत उच्च है, वैसे ही सभी शीलों में, व्रतों में अहिंसा नामक व्रत ऊँचा - उत्कृष्ट है ।
सदासुखदासजी