
सव्वो वि जहायासे लोगो भूमीए सव्वदीउदधी ।
तह जाण अहिंसाए वदगुणसीलाणि तिट्ठंति॥792॥
ज्यों नभ है आधार लोक का द्वीप उदधि का भू आधार ।
वैसे ही व्रत शील गुणों का मात्र अहिंसा व्रत आधार॥792॥
अन्वयार्थ : जैसे आकाश में सर्व लोक रहता है और भूमि में सभी द्वीप-समुद्र हैं, वैसे ही अहिंसा में सर्व व्रत-गुण और शील बसते हैं- ऐसा तुम जानना ।
सदासुखदासजी