कुव्वंतस्स वि जत्तं तुंबेण विणा ण ठंति जह अरया ।
अरएहिं विणा य जहा णट्ठं णेमी दु चक्कस्स॥793॥
बी बिना चक्र के आरे आरों के बिन धूरि नहीं ।
चाहे यत्न करो कितने आधार बिना वे रहें नहीं॥793॥

  सदासुखदासजी