
तह जाण अहिंसाए विणा ण सीलाणि ठंति सव्वाणि ।
तिस्सेव रक्खणट्ठं सीलाणि वदीव सस्सस्स॥794॥
वैसे ही नहिं शील ठहरते बिना अहिंसा धर्माधार ।
शील अहिंसा की रक्षा के लिए अन्न रक्षा को बाड़॥794॥
अन्वयार्थ : जैसे रथ के चक्र/पहिये में प्रयत्न करने पर भी तुम्ब/धुरा के बिना आरा नहीं टिकते हैं, आरा बिना चक्र की नेमि-धुरा नष्ट हो जाती है, वैसे ही अहिंसा धर्म बिना समस्त शील नहीं रहता । अहिंसाव्रत की रक्षा के लिये धान्य की बाड की तरह शील रहता है ।
सदासुखदासजी